14 October 2017

 पुरातत्ववेत्ता बनना है कि पुलिसवाला 
     शरद कोकास 

     मैं और रवीन्द्र चम्बल के घाट से लौट कर आए  तो देखा डॉ.वाकणकर , किशोर ,अशोक,राममिलन और अजय एक्सप्लोरेशन हेतु फुलान जाने के लिए तैयार खड़े थे । हम दोनों ने जल्दी जल्दी नाश्ता किया और उनके साथ चल पड़े । आकाश में बादल ज़रूर थे लेकिन बारिश थम गई थी । वैसे भी फरवरी की यह बारिश बिन मौसम ही थी । हम लोग पैदल पैदल दंगवाड़ा के लिए  रवाना हो गए ।  रात की बारिश के फलस्वरूप नाले में पानी बढ़ जाने की संभावना को देखते हुए सर हमें दूसरे  रास्ते से ले गए  । इस रास्ते के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं थी । हमने सर से कहा तो उन्होंने जवाब दिया .."भाई ,पुरातत्ववेत्ता एक खोजी की तरह होता है ,उसे हमेशा नए रास्तों की जानकारी होना चाहिए ,जब वह ज़मीन के भीतर रास्ते खोज सकता है तो ज़मीन पर भी रास्ते खोज सकता है , और रास्ते ही नहीं लुप्त हो चुकी नदियाँ और ज़मीन के नीचे दबे हुए पहाड़ भी खोज सकता है । "

     गाँव के बाहरी छोर पर सड़क थी । हम लोग सड़क के किनारे खड़े रहकर बस की राह देखने लगे ।  उन दिनों शहरों में ही बस स्टॉप बहुत कम हुआ करते थे सो गांवों में होना तो बहुत मुश्किल था  । थोड़ी देर में बस आई जिसमें सवार होकर हम लोग नरसिंगा तक गए  । नरसिंगा , दंगवाड़ा से सात किलोमीटर दूर इंगोरिया - गौतमपुरा मार्ग पर स्थित है । वहाँ से पूर्व में लगभग एक किलोमीटर पर है फुलान का टीला । हम लोग पैदल चलते हुए कुछ ही देर में टीले पर  पहुँच गए ।

     " चलो सज्जनों शुरू हो जाओ , यहाँ प्राचीन सभ्यता के अवशेष बिखरे पड़े हैं , ढूँढो ,देखें तुम लोगों को क्या क्या मिलता है  ।"  डॉ.वाकणकर ने आदेश दिया । हम लोग किसी खोई हुई वस्तु को ढूँढने की मुद्रा में झुक झुक कर टीले पर अवशेष ढूँढने लगे । निश्चित ही सर भी हमारा साथ दे रहे थे । अचानक अजय की आवाज़ आई .." सर बैल ,सर बैल " देखा तो अजय के हाथ में मिटटी का एक टेराकोटा बैल था । रवीन्द्र ने घूरकर अजय की ओर देखा । सर क़रीब आ गए थे । उन्होंने बैल की प्रतिमा को हाथ में लेकर कहा .."शाब्बास यह पकी हुई मिटटी का टेराकोटा बैल है , और ढूँढो । "

     हम लोगों के हाथ अभी तक कुछ नहीं लगा था और हम लोग निराश हो रहे थे । "ऐसा लगता है यहाँ कुछ नहीं मिलेगा ।" मैंने ठण्डी साँस भरते हुए कहा । सर ने मेरी बात सुन ली और कहा " देखो भाई , यह मनोविज्ञान का नियम है , यदि आपने सोच लिया कि यहाँ कुछ नहीं मिलेगा तो सामने पड़ी हुई वस्तु भी आपको नहीं दिखाई देगी । घर में ऐसा नहीं होता क्या ,हम किसी चीज़ को किसी निश्चित जगह पर ढूँढते हैं और सोच लेते हैं कि वह वहाँ हो ही नहीं सकती,जबकि वह वस्तु उसी स्थान पर रखी हुई होती है । सो पहले उस वस्तु की इमेज मन में बनाओ और फिर उसे ढूँढना प्रारंभ करो ।" सर की बात सुनकर हम लोगों ने दुगुने उत्साह से वस्तुओं को ढूँढना प्रारंभ कर दिया और आश्चर्य यह कि हमें उन्हीं स्थानों पर वे वस्तुएँ मिलने लगीं जहाँ से होकर हम पहले एक बार जा चुके थे । इस तरह फुलान के उस टीले पर दो घंटे के एक्स्प्लोरेशन में हमें दो टेराकोटा बुल ,स्वास्तिक चिन्हों से युक्त कुछ सिक्के , आहत सिक्के, मिट्टी के बाँट,तथा कुषाण कालीन मिट्टी के मृद्भांड जैसी महत्वपूर्ण वस्तुएँ प्राप्त हुईं ।

     सब लोग तन्मयता से टीले पर बिखरे पड़े अवशेष ढूँढने में लगे थे कि अचानक अजय ने सवाल किया “ यार ये मृद्भांड मिट्टी के ही क्यों होते हैं, ताम्बे के या सोने चांदी के क्यों नहीं होते ? “ रवीन्द्र ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और कहा “ अरे बेवकूफ ,मृद्भांड हैं तो मिट्टी के ही होंगे ना , मृदा का अर्थ ही मिट्टी होता है , तेरे से इसलिए  कहा था कि सुबह सुबह नहा लिया कर , नहाने की गोली खाने से ऐसा ही होता है । “ अजय बेचारा बगलें झाँकने लगा । “चलो रे सज्जनों । “ इतने में डॉ. वाकणकर की आवाज़ आई “ यह सब अवशेष झोले में रख लो ,चलो अब फुलान गाँव चलते हैं ।“ “गाँव जाकर क्या करेंगे सर ? “ अशोक इतनी ही देर में ऊब गया था । “ अरे चलो तो,  यहाँ गाँव में भी बहुत सुन्दर मन्दिर और मूर्तियाँ हैं ।“ सर ने कहा । अशोक की ऊब का कारण मैं समझ गया था कि उसे  सिगरेट की तलब लगी थी । मैंने धीरे से कहा “ तू चल तो ..तेरे लिए वहाँ भी इंतज़ाम है, किसी भी मन्दिर के पिछ्वाड़े जाकर सर और भगवान की  पीठ पीछे यह बुरा काम कर लेना । “ यह सुनते ही अशोक की ऊब हवा हो गई । सर ने एक बार हमारी ओर देखा, हमें पता था हमारी कानाफूसी में छुपी बात उनकी समझ में नहीं आई है ।

     गाँव में प्रवेश से पहले ही बाहर एक चबूतरे पर हमें गणेश की एक दक्षिणावर्त प्रतिमा के दर्शन हुए । दक्षिणावर्त गणेश प्रतिमा अर्थात वह प्रतिमा जिसमें गणेश की सूंड दाहिनी ओर घूमी हुई हो । इसके विपरीत वामावर्त प्रतिमा होती है । “अरे वाह ... “ डॉ.वाकणकर ने प्रतिमा देखते ही कहा “ श्री गणेश तो अच्छा हुआ है । “ आगे बढ़ते ही हमें एक और चबूतरे पर नन्दी पर आसीन शिव-पार्वती की प्रतिमा, गरुड़ पर आसीन लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा ,जटाधारी शिव और भैरव की प्रतिमा भी मिली । हालाँकि उनमें से बहुत सारी प्रतिमाएँ खंडित थीं ,किसी के हाथ नहीं थे तो किसी के सर नहीं थे । सर ने बताया “ ध्यान से देखो, यह सब नवीं से ग्यारहवीं शताब्दी की परमार कालीन शिल्प की प्रतिमायें हैं । “ “ मतलब यहाँ परमारों का शासन रहा है ?” अशोक ने पूछा । “ और क्या “ सर ने कहा ...“ उनके बहुत से अभिलेख भी यहाँ मिलते हैं । “ इतने में पास के ही एक चबूतरे से अजय ने आवाज़ दी “ सर मेरी समझ में नहीं आ रहा यह किसकी प्रतिमा है ।“ सर के साथ हम लोग भी वहाँ पहुँचे । अजय एक टूटी-फूटी प्रतिमा के सामने खड़ा हुआ अपना सिर खपा रहा था ।

     “ देखो ।“ सर ने समझाते हुए कहा “ किसी भी प्रतिमा को पहचानने के लिए  उसके लक्षण देखना ज़रूरी है , जैसे शिव प्रतिमा के लक्षण हैं मस्तक पर चन्द्र,गले में सर्प ,हाथ में त्रिशूल,डमरू इत्यादि । भैरव को भी शिव का रूप माना जाता है लेकिन उनकी प्रतिमा में एक दण्ड उनके हाथ में होता है । उसी तरह विष्णु प्रतिमा में उनके चार हाथ होते हैं  जिनमें शंख,चक्र,गदा और पद्म याने कमल का होना अनिवार्य है । अब इसमें हाथ तो सब टूट गए  हैं लेकिन अन्य लक्षण कमोबेश उपस्थित हैं , जैसे मुकुट है और इस टूटे हुए हाथ की बनावट नीचे की ओर है जिसके नीचे गदा साफ साफ दिखाई दे रही है ,मतलब यह विष्णु की प्रतिमा हो सकती है । “ सर अगर यह गदा भी टूट जाती तो हम इसे कैसे पहचानते ? “ अशोक ने पूछा । “ तो हम प्रतिमा में शंख, चक्र या पद्म को ढूंढते । “ सर ने कहा । “ और सर ये शंख ,चक्र, पद्म भी नहीं होते तो ? “ अशोक ने फिर पूछा । “ तो हम आभूषणों से या मुकुट से  या वस्त्रों से प्रतिमा की पहचान करते “ सर ने कहा । “ और सर प्रतिमा पर आभूषण और वस्त्र भी नहीं होते तो ? “ अशोक ने फिर सवाल दागा ।“

     डॉ.वाकणकर हँसने लगे “ तुम ये बताओ यार ,तुम्हें  पुरातत्ववेत्ता बनना है कि पुलिसवाला या वकील ? अरे कुछ भी नहीं रहता तो फिर पत्थर और प्रतिमा में फर्क ही क्या रह जाता । शिल्पकार की छेनी और हथौड़े से उकेरे प्रतिमा के ये लक्षण ही तो पत्थर को प्रतिमा बनाते हैं , फिर लोग उसे भगवान बनाकर उन  मूर्तियों की पूजा करते हैं और उसे गढ़ने वाले शिल्पी को भूल जाते हैं । शिल्पकार का श्रम किसीको याद नहीं रहता ,लोग या तो मूर्ति को याद रखते हैं या पैसा लगाकर उसे बनवाने वाले को । चलो आज का काम खतम ...भूख लग रही है वापस चलें । “ हम लोगों ने घड़ी देखी, शाम के चार बजने वाले थे और हम लोगों ने लंच भी नहीं लिया था इसलिए  वापस जाना तो ज़रूरी था । लौटते हुए मैंने जनता का भूख से ध्यान हटाने के लिए एक पहेली बुझवाई  “ मान लो आज से हज़ार साल बाद का दृश्य है जब किसी शिल्पी द्वारा बनाई हुई डॉ. वाकणकर की ऐसी ही भग्न प्रतिमा मिलती है और एक जन कहता है  कि “ यह तो विष्णु की प्रतिमा है “ बताओ वह सच कह रहा है कि झूठ ? किशोर बोला “ वह झूठ बोल रहा है । “ मैंने कहा “ नहीं वह सच बोल रहा  है ,जानते नहीं ? डॉ. वाकणकर का पूरा नाम विष्णु श्रीधर वाकणकर है । “

अक्टूबर 2017 में प्रकाशित |



 लेखक पुरातत्वेत्ता, कवि और कहानीकार हैं |
सम्पर्क- +918871665060 , sharadkokas.60@gmail.com

12 October 2017

     ग्राम-ज्ञान व्यवहार : अयाची, लोक और सरिसब

           सविता खान 

आजादी पूर्व जब हम भारत की ज्ञान परंपरा की तहकीकात करते हैं तो भारत के गिने चुने नवोदित शिक्षा केंद्रों से कहीं व्यापक और प्रशस्त परिवेश गांव-गांव में फलफूल रहा था। इसी ग्रामीण सन्दर्भ में  यहां उत्तर बिहार के प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र  मिथिला की गिनती और जिक्र इसलिए आवश्यक है क्योंकि भारत के  प्रमुख दार्शनिक धाराओं जैसे न्याय और मीमांसा, वैशेषिक और वेदांत दर्शन परंपरा के साथ ही संकृत व्याकरण वैकासिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण और विख्यात रहा है |
भारतीय दर्शन परंपरा यहां की खालिस ग्रामीण क्षेत्रों से जन्मे थे उनका अस्तित्व न्याय की भूमि और केंद्र रहे मिथिला में इसकी अधोगति जारी है| इसका जाहिरी असर सिर्फ संस्कृत  भाषा के विनाश में ही नहीं बल्कि उससे उपजे समस्त ज्ञान परंपरा के विनाश में देखा जा सकता हैजर्मनी में हाय्डेलबर्ग विश्वविद्यालय में इंडोलोजी विभाग  के प्रमुख प्रोण् एक्सेल मायकेल हैरत में दीखते हैं कि राजनीती और एक खास विचारधारा की आड़ में एक समस्त ज्ञान परंपरा को ख़त्म कर देना कितना त्रासद है, साथ ही आजाद भारत के खड़े हो रहे नये मंदिरों में गांव की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की गई, उद्योग धंधों की सफलता के  इर्द गिर्द जिन शहरी विकास के प्रारूपों का निर्माण किया गया उसमें गांधी के स्वराज के मूल कर्णधार गांव कहीं पीछे धकेल दिये गये, अब उन्हें मात्र कृषि क्षेत्र मान बाकी सारे सभ्यता मूलक गतिविधियों यथा ज्ञान परंपरा और भाषाई विकास की परिकल्पना से बाहर कर दिया गया। यह जिक्र करना भी यहां जरुरी होगा कि आखिर इस  ज्ञान परंपरा का स्वरूप लोकोन्मुखी था या नहीं, पुराण और उपनिषदों की व्याख्या यहां लोक धर्म के अनुसार किया जाता रहा है इसका प्रमाण हमें याज्ञवल्क्य स्मृति(इसी पर लिखी टीका मिताक्षरा से आज भी संपत्ति सम्बन्धी विवादों में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती है,निर्णय लिया जाता है, याग्यवलक्य की भूमि भी मिथिला ही मानी जाती है) में मिलती है |
धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिला व्यवहारतः दृ याज्ञवल्क्य स्मृति(धर्म के निर्णय को समझना हो तो मिथिला के व्यवहार को देखना होगा, साबित करता है कि सामान्यतया इस प्रदेश में प्रचलित ज्ञान परंपरा अंततः कोई निर्जीव वस्तु नहिं होकर लोक व्यवहार में परिलक्षित थी और इसके लोकोन्मुखी होने के कई आख्यान हमें वहां की प्रचलित किस्सों में मिलता है|  
मिथिला के कलेक्टिव विजडम, विपन्नता का विलास और कॉमन रिसोर्सेज के स्वतः स्फूर्त लोक उत्पत्ति का बड़ा ही रोचक नमूना था, यह खिस्सा सरिसब गाँव  के दग्धरिध्चमैनिया पोखरि के उत्त्पति का था, कई परतों और प्रतीकों से गुजरता यह किस्सा(अयाची मिश्र, शंकर मिश्र, चमैन, दान) अंततः जल के श्रोत पर ठहर गया कि कैसे एक चमैन ढेर सारा धन मिलने पर चूँकि अपने मूल गुणों(स्किल)  से च्युत होना नहीं चाहती, वह पोखरि खुदवा कर अंततः एक सर्वसामान्य के हित में निर्णय लेती हैप् आखिरकार दर्शन का इससे उजागर चरित्र हम कहाँ और  किनप्रकरणों में तलाश सकते हैं जहाँ जनसामान्य का जीवन एक दर्शन, नीति(एथिक्स) से चलता होघ् संभवतः इतनी स्वायत्तता बिरले ही आज कोई विश्वविद्यालय वा शैक्षणिक संस्था सीखा पाए प् मसला यह है कि यह लेयर्ड विजडम गया कहाँघ् तालाब कहाँ गए और जातिगत प्रपंचों को इन जैसे प्रकरण क्यूँ नहीं दिशा दिखा पाएघ् कभी पौराणिक ग्रन्थ देवी भागवत मे मिथिला के  प्रजा के  सदाचारऔर  समृद्धि का  मनोरम वर्णन किया  गया है :-
प्रविष्टो मिथिला मध्ये पश्यन्‌ सवर्द्धिमुत्तमाम्‌।
प्रजाश्‍च सुखिताः सर्वाः सदाचाराः सुसंस्थिता ॥
आज जब इस कृषिप्रधान, श्कृषिश्क्रांतिश् वाले दार्शनिक देश में कृषि, कृषक और विद्या तीनों ही अपनी अत्यंत अधम दशा में हैं तो सवाल लाज़िमी है कि यह ह्रास कहाँ और कब से आया। जिस देश में जनक और विदेह जैसे अद्भुत नामकरण रहे हों, जनक जो हर किसी को जन्मने जैसा दायित्व बोध से प्रेरित हो और विदेह, जिसका अपनाए स्व कुछ भी न हो और वो राजा हो, हल तक चलाता हो, बेटी को ज़िंदा खेत में गारता न हो, बचाता होप्कुछ परिवर्तन जो बुद्धिजीवियों ने षड्यंत्र के तहत किये जैसे ग्यारह्न्वीं शताब्दी से धर्मशास्त्र का पक्ष प्रबल होता चला गया, ऐसे में 13-14 वि शताब्दी तक विद्याओं का वर्टीकल वर्गीकरण कर दिया गया, हॉरिजॉन्टल वर्गीकरण तो प्राचीनकाल से था मगर उसमें कोई भी व्यवसाय वा विद्या मुख्य या गौण नहीं था, पर अब कृषि और अन्य सेक्युलर वृत्तियों को गौण कर दिया गया, इसी काल से एक संस्कृत कहावत भी हैरू ष्शाश्त्रेषु नष्टः कव्यो भवन्ति, काव्येषु नशटाश्च पुराण प्रथाःए तत्रापि नष्टाः कृषिम अश्रायन्तेह, नष्टाः क्रिष्टेर भागवत भवन्तिष् अर्थात वर्गीकरण में शाष्त्र, काव्य शाष्त्र, पुराण प्रवचन, कृषि कार्य और जो कुछ भी ना कर सकें वो साधू बनेंगे, जब कृषि पर ही पूरा समाज टिका हो ऐसे में इस विद्या को ही गौण कर देना रुग्णता ही थी, जबकि जनक का स्वयं हल चलाने का लीजेंड इस बात का द्योतक है कि कृषि विद्या का सम्मान अन्य विद्याओं के समान ही था जो मध्य युग आते आते हल छूना भी ब्राह्मण का पाप मान लिया गया, कृषि विद्या आधारित ग्रंथों में कृषि पराशर( दसवीं सदी) केपश्चात् शायद ही कोई ग्रन्थ की भी रचना हुई होए पर जनक का हल प्रकरण एक अद्भुत मैसेज है आज के सिंघासनाधीन राजाओं केलिएप् साथ ही एक उ)रण से समझा जा सकता है कि आखिरकार इन राज्यों में किसी विद्या का पोषण था या नहीं यदि था तो उसका स्वरुप कैसा थारू
इत्येते मैथिलारू। प्रायणैते आत्मविद्याश्रयिणो भूपाला भवन्ति।
अर्थात् (यह समस्त मैथिल भू-पालगण हैं ए  प्राय: ये  समस्त वर्ग  ष्आत्मविद्याष् को  आश्रय देनेवाली प्रवृत्ति के हैं ) तो आखिकार यह समझना होगा की यह आत्मविद्या क्या थी, कहाँ लोकेटेड थी और क्या इसका स्वरुप इतना लिबेरेटिंग था कि समस्त विश्व में चल रहे आत्मा-शरीर के द्वैधता समझ से उपजे क्राइसिस(कार्तेसियन द्वैधता) को एक समाधान दे सके और क्या इस सबके केंद्र रहे मिथिला और उसके ज्ञान परंपरा, व्यवहार विज्ञान और लोकोन्मुखी प्रवृत्तियों से ही गाँधी का उपनिवेश को दिया जा रहा ग्राम स्वराज जैसा इंक्लूसिव, सभ्यतामूलक डिस्कोर्स अपनी नियति को प्राप्त कर पायेगाघ् संभवतः मिथिला के गांवों में पिछले सदी तक फल फूल रही, स्वायत्त ज्ञान परंपरा जो कुछ खास गाँव में कम से कम संसाधनों में नैयायिकों और मीमांसकों के घरों से चलती थी उसमें राज्य वा कोई अन्य सत्ता न तो पाठ्यक्रम तय कर रहा था न ही डिग्री और परीक्षा का यह विकृत, जानलेवा, बाजारोन्मुखी, भौतिकवादी  स्वरुप कहीं से भी ग्रामीण लोक समाज पर इस कदर हावी था कि आज की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी को महामारी बना दे, अपेक्षा ज्ञान संकलन और आत्मविद्या से परिमार्जन की थी महज रोजगार की नहीं ए मनुष्य को, युवा को महज रोजगार का माध्यम नहीं समझा जा रहा था, इसी ज्ञान परंपरा के ह्रास से संभवतः राज्य, रोजगार और शिक्षा को आवंटन करने वाली प्रबल शक्ति बनती चली गयी और लोक की, गांवों की स्वायत्तत्ता अपनी आत्मविद्या के बल पर  कभी एक  पुख्ता रिस्पांस नहीं  खड़ा  कर पायी जो राज्याश्रय के बिना भी अपनी ज्ञान परंपरा को अक्षुण्ण रख सकता था  और आज हालत यह है कि हम दान नहीं  अनुदानों के कुचक्र में अपनी स्वयत्तता को तलाशने का भागीरथ और असफल प्रयास कर रहे हैं|
  
पर इन्हीं विषम परिस्थितियों  में जब मिथिला के एक गाँव सरिसब-पाही और उसकी संस्था अयाची डीह विकास समितिए कुछ ग्रामीण नैयायिक विद्वान और वहां के आम लोग जब अपने ज्ञान परंपरा के मूल को लेकर ,क भागीरथ प्रयास (कार्यक्रम का आयोजन सरिसबपाही गाँव की संस्था  ष्अयाची डीह विकास समितिष् ने किया था,भारतीय दर्शनों के प्रसिद्ध  विद्वान पंडित किशोर नाथ झा इसके अध्यक्ष थे और श्री नविन जायसवाल  और  श्री  अमल कुमार झा संयोजक)करने को अग्रसर हुए  जिसमें उन्होंने भारत भर से न्यायशाष्त्र से प्रकांड विद्वानों को इकठ्ठा कर चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी के  सुप्रसिद्ध मैथिल  विद्वानों अयाची(भवनाथ मिश्र) और शंकर मिश्र( इनके गाँव सरिसब में इनका चौपाड़ी(गाँव के बीच बसा एक ओपन स्पेस) ही इनका ज्ञानकेंद्र था, किसी भवन, राजभवन और राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर पर आश्रित हो इनकी ज्ञान परंपरा ने दम नहीं तोडा बल्कि गाँव के खुले परिवेश में  बिना किसी बंधन, भेदभाव की बाध्यता के बगैर उनके ज्ञान का विमर्श चलता रहा)   पर परिचर्चा और चमैनिया डाबर(तालाब) पर सितम्बर(9-10 सितम्बर) माह में  विमर्श  का केंद्र बना तो आशा जरूर बनती है कि न तो भारत के गाँव मरेंगे, न उसकी लोक उर्जा कम होगी और न ही वहां की ज्ञान परंपरा के आत्मविद्या तत्त्व के प्रति विश्व का रुझान कभी कम होगा क्यूंकि गांधी का भारत वहीँ साकार है और इसी ज्ञान परंपरा को गाँधी ने ष्सुन्दर वृक्षष्(अ ब्यूटीफुल ट्री) कहा था जिसमें उपनिवेश के प्रतिरोध का भरपूर बीज छुपा था और जो आज के भी नव उपनिवेशवाद का एक व्यापक रिस्पांस(प्रत्युत्तर) देने की माद्दा रखता है बशर्ते कि ज्ञान परंपरा को उसके मूल ग्राम्य परिवेश से जोड़कर ही किसी विकास का मॉडल तैयार होप् सवाल यह भी है कि पंद्रहवीं सदी के शंकर मिश्र के चौपाड़ी जैसे ज्ञान परंपराए शिक्षा के  प्रारूप पर अभी तक विमर्श क्यूँ नहिं हो रहा, क्यूँ आज के राज्य और लोक ऐसे ओपन स्पेस की स्वायत्तता को मूल्य नहीं दे रहेघ् आखिरकार एक गाँव और उसके ग्रामीणों के कलेक्टटिव विजडम ने ही इतना बड़ा बीड़ा उठाकर यह साबित किया है कि गाँव अभी मरे नहीं और शंकर मिश्र का चौपाड़ी अपना स्वरुप बदल कर ही सही फिर से ज्ञान परंपरा का केंद्र बनने की क्षमता रखता है वहीँ कुछ अवलोकन हैं जो सरिसब यात्रा (जिसमें   जवाहर लाल नेहरू वि0 वि0 से प्रोफेसर मनीन्द्र नाथ ठाकुर के साथ ही  प्रोफ़ेसर अख़लाक़ अहमद, ष्सेंटर फ़ोर स्टडीज  ओफ़ नॉलेज एंड  ट्रेडिसनष् के अमित आनंद, पानी की समस्या पर काम करनेवाले और ष्वाटर मैन ओफ़ इंडियाष् के नाम से प्रसिद्ध राजेंद्र सिंह के संगठन से जुड़े पंकज कुमार भी हमारे साथ थे) के उपरांत जन्मे, पहला यह कि इस पूरे आयोजन ने ज्ञान प्रकरण की खोज और उत्सुकता में एक नए मॉडल की स्थापना की, जिसमें आयोजन का समस्त खर्च सरिसब और आस पास के ग्रामीणों ने अपने संगृहीत पैसे से वहन कर यह साबित किया कि गाँव अभी भी संकल्प और स्व-निर्भरता में  काफी आगे खड़े हैं(सरिसब गाँव की ही साहित्यिकी नामक संस्था साहित्य के प्रकाशन और प्रचार- प्रसार  में स्व-निर्भरता के मिसाल पहले कायम कर चुकी है), दूसरा कि ग्रामीण स्तर पर अपनी ज्ञान परंपरा को रिक्लेम करने की चेतना और प्रयास दोनों ही सफल दिशा में परिवर्तित हो सकते हैं, पर कुछ बिन्दुयें हैं जो विचार- विमर्श योग्य  हैं |

   क्या ज्ञान परंपरा मात्र शाश्त्रीय अध्ययन तक सिमित है, इसका कन्वर्जन क्या लोक मानस और चेतना तक हो पा रहा है या फिर यह सिर्फ ज्ञान को ,क दूरस्थ आकर्षण तक ही सिमित तक उसे अनुपयोगी बना देगाघ् फिर सवाल यह है कि इन शाश्त्रीय दर्शनों की उपजाऊ भूमि में इस ज्ञान को लोकेट कहाँ किया जाए, क्या यह सचमुच मर चूका है या महज अपने रूप-भाषा  सम्प्रेषण को अनुदित कर लोक के एक विशाल संसार में मुहावरा, फकरा,खिस्से, अन्य व्यवहारपरक कर्मों में दैनिक प्रचलन में अभी भी जिन्दा है और हम उसे मरा समझ विलाप किये जा रहे हैं, ऐसा मुझे खासकर एक प्रसिद्द नैयायिक की सहधर्मिणी के उस वक्तव्य से कौंधा जब वह यह कह रहीं थीं कि उन्हें दर्शन का कोई ज्ञान नहीं, यह आश्चर्यजनक था जबकि दर्शन  उनके घर का दैनिक विमर्श-कर्म है, या तो जिस तरह से अप्रत्यक्ष तौर पर वह लौकिक व्यवहार में उस दर्शन-समझ को प्रतिदिन उतार रहीं हैं वह भी दर्शन ही है यह समझ नहिं बन रही या फिर दर्शन का व्यवहारिक पक्ष क्या और कैसा होगा यह तय किया जाना बाकी है | जब यह व्यवहारिक पक्ष तय और लोकेट कर लिया जाएगा जिसमें लोक व्यवहार का एक विषदए जागता संसार है फिर हम दर्शन चाहे वह न्याय हो या मीमांसा हम उसे बेहतर समझ पायेंगे और वह मरा नहीं मात्र शाश्त्रीय अध्ययन के स्तर पर कमजोर हो गया है |
   इस मंतव्य के साथ कि ज्ञान विमर्श अंततः लोक और लोक दैनिक व्यवहार की ही थाती है सरिसब गाँव में मुख्यमंत्री के भाषण और अयाची, चमैन प्रतिमा अनावरण के बाद विद्वत समाज के भाषणों को सुनने और समझने के लिए न्यूनतम भीड़ भी क्यूँ नहिं बचीघ् क्या विद्वान् और शाष्त्र का लोक-कन्नेक्ट इस हद तक टूट चूका है, क्या हम अपने सम्प्रेषण में इतने कमजोर हो चुके हैं कि ज्ञान विमर्श एक बोझिल, अबूझ प्रकरण बन कर रह गया हैघ् क्या संवाद के मोड बदलने होंगेघ् या फिर अयाची और शंकर मिश्र के  न्याय, नब्न्याय शाष्त्र का प्रकांड ज्ञान संसार सिर्फ रिक्लेम  करने के रिचुअल तक सिमट कर रह गया हैघ्   क्या शंकर मिश्र के चौपाड़ी जैसे खुले सार्वजनिक स्पेस को हमने इस कदर बंद कमरों में समेट कर रख दिया कि उसका आकर्षण और समझ ही ख़त्म हो गयाघ्
  सार्वजनिक हित में डाबर खुदवाने वाली  चमैन जो इस आयोजन और अयाची ओरल ट्रेडिशन की एक प्रमुख बिंदु है, की प्रतिमा का अनावरण डाबर के घाट पर कुछ स्थानीय एन्क्रोचमेंट की वजह से नहीं हो सका, क्या यह इस ज्ञान भूमि में मर रहे पारस्परिक संवाद का परिचायक नहीं हैघ् क्या ज्ञान और ज्ञानी विद्वान् स्थानीय, दैनिक स्तर पर संवाद करने में सक्षम नहीं हैंघ् क्या न्याय के शाश्त्रार्थ की वाइब्रेंट परंपरा पंडितों के एक वर्ग तक ही सिमट कर मात्र ज्ञान प्रदर्शन और पारितोषिक संकलन मात्र का जरिया बन कर रह गईघ् एक बात और भी समझना होगा कि चमैनिया डाबर का जल किसी भी मांगलिक कार्य के लिए प्रयोग में नहीं लाया जाता है क्यूंकि उसकी स्थापना में यज्ञ और जाठी का प्रयोग नहीं हुआ था, यह मांगलिकता मात्र एक मिथ का निर्माण है, तो क्या अपने जल संसाधन जैसे उपयोगी प्रकरणों को भी हम मात्र मिथ निर्माण में ही भसा देंगेघ् जबकि आज वह डाबर लिढ(लिधि)  से भरा किसी भी उपयोग में नहिं रह गया है मात्र मिथ निर्माण कर रहा हैण्
    और आखिरी चिंता यह कि इस पुरे ज्ञान विमर्श का इस वृहत आयोजन के बाद क्या दिशा होगीघ् क्या राज्य अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन लोक कल्याण में ज्ञान के पुनर्जागरण के लिए कर पायेगाघ् साथ ही मिथिला में ही दरभंगा के मिथिला रिसर्च इंस्टिट्यूट जैसे समृद्ध संस्था जो १९५२ के बाद से ही न्याय और तंत्र के मौलिक मैनुस्क्रिप्ट से भरा पड़ा धुल फांक रहा है, की गति को देखते हुए राज्य से हम क्या अपेक्षा रख रहे हैं और क्यूँ रख रहे हैंघ् क्या स्थानीय ज्ञान परंपरा का वह स्वायत्त काल जिसमें अयाची और शंकर मिश्र का स्व-निर्भर स्वरुप इतनी समृद्ध न्याय शाष्त्र इतनी सहजता से  गढ़, रच गया, राज्य उसे समझ पायेगा, आदर कर पायेगा या फिर राज्य का थिंकिंग क्लास से खतरा और डर कभी भी इस वर्टीकल आर्डर को नहीं टूटने देगा जिसमें सरिसब गाँव मुख्यमंत्री के भाषण के उपरान्त अपनी पीठ विद्वानों की तरफ मोड़ लेता है, आखिरकार यह संरचना राज्य के काम का है यह उसे क्यूँ तोडना चाहेगाघ् लोगों की निर्भरता जितनी बनी रहे दोहन उतना आसां होगा क्या ज्ञान परंपरा के संवाहक गाँव इसे नहीं समझ पा रहे कि जैसे आयोजन उनकी संगठित बल और प्रयास का सफल परिणाम साबित हुआ वही स्थानीयता ही उन्हें ज्ञान विमर्श को आगे ले जाने में अहम् साबित होगी जिसमें लोक व्यवहार में ज्ञान को पकमदजपलि करना और समझना मुख्य बिंदु हो |  
 

लेखिका जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, दिल्ली में इतिहास की प्राध्यापिका हैं |
सम्पर्क - +919871987471 ,   savita.khan@gmail.com

02 October 2017

बुद्ध, गांधी और हाशिए की आवाज 

ईश्वर दोस्त

भारत की जिन शख्सियतों ने सारी दुनिया को प्रभावित किया, उनमें निर्विवाद रूप से दो नाम उभरते हैं। ये हैं गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी। बुद्ध के बाद जिस भारतीय ने बड़े पैमाने पर दुनिया को अभिभूत किया, वेमहात्मा गांधी हैं। नेल्सनमंडेला, मार्टिनलूथरकिंग जैसे उनके अनुयायियों की विश्व इतिहास में अनूठी जगह है। मनुष्य और मनुष्य के बीच की हिंसा तथा प्रकृति और मनुष्य के गड़बड़ाते संबंधों के बीच गांधी आज भी उम्मीद हैं। गांधी के प्रति दुनिया के राजनीति विज्ञानियों, इतिहासकारों और दर्शनशास्त्रियों का आकर्षण तो बढ़ा ही है, सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता और लेखक, कलाकार भी गांधी की छवि की ओर खिंचे हैं।
बुद्ध और गांधी दोनों ने करूणा और अहिंसा के संदेश दिए। दोनों अकादमिक अर्थ के विचारक नहीं थे, बल्कि साधारण जन-जीवन को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहे थे। दोनों ने जो कहा उसे जिया भी। दोनों ने नैतिक जीवन कैसा होना चाहिए, इस प्रश्न को एक सार्वजनिक आंदोलन में तबदील कर दिया। बुद्ध और गांधी सैंकड़ोंसालों के अंतराल में पैदा हुए। मगर दोनों के बीच समानताओं का सिलसिला सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता!
दोनों के बीच एक बड़ी समानता यह भी है कि बुद्ध और गांधी भारत के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में धीरे-धीरे किनारे कर दिए गए। बुद्ध धर्म पूरे एशिया में फैल गया और पश्चिम को भी बुद्ध दर्शन और इसकी आध्यात्मिकता ने बड़े स्तर पर प्रभावित किया। मगर भारत में बुद्ध विचार और धर्म हाशिए पर चला गया।जिस बुद्ध धर्म और विचार को विश्व को भारत की देन के रूप में जाना जाता है, उसकी स्वयं भारत में उपस्थिति सबसे क्षीण हो गई। हालांकि आजादी के आंदोलन के दौरान बुद्ध एक बार फिर क्षितिज पर उभरते दिखाई दिए हैं। उसी दौरान धर्मानंदकोसांबी, राहुल सांस्कृत्यायन और भदंत आनंद जैसे मनीषी पैदा हुए। और यह सिलसिला नवयान से होता हुआ आज तक जारी है। मगर आज भी वैश्विक स्तर पर बुद्ध विचार पर जितने शोध हो रहे हैं और उन पर विमर्श हो रहा है, उनमें भारत का अनुपात बेहद कम है।
इसी तरह गांधी की ख्याति भारत को लांघते हुए विश्व पटल पर आजादी की लड़ाई के दौरान ही पहुँच चुकी थी। दुनिया के हजारों बुद्धिजीवियों, महापुरूषों ने गांधी की आवाज को सुना और उसके मर्म को समझने की कोशिश की। मगर भारत में गांधी पहले शारीरिक रूप से खत्म कर दिए गए। फिर उनकी मानसिक उपस्थिति भी दीर्घकालीन दुरभिसंधियों के कुचक्र के हवाले होती गई। यहाँ यह साफ करना जरूरी है कि गांधी से असहमत होना एक बात है, और उन्हें घृणा का पात्र बनाना एकदम दूसरी। गांधी आलोचना के पात्र हों, यह स्वयं गांधी चाहेंगे। लेकिन गांधी वध क्यों जरूरी था, इस संदेश का प्रचार-प्रसार करना गांधी से असहमत होना भर नहीं है।
आजाद भारत में गांधी सड़कों के नाम-पट्टों, जड़ी हुई तस्वीरों और सरकारी रस्म-अदायगी में सिमटते चले गए। पूँजीवादी विकास के जिस रास्ते पर आजाद भारत की सत्ता चली, उसमें आखिरी आदमी की बात करना अटपटा था भी। मध्यवर्गीय भारत के लिए गांधी आदर का कम मजाक का विषय ज्यादा बनते गए। यह मध्यवर्ग जब उपभोग और नफरत की जुगलबंदी के आज के दौर तक पहुँचा, तब गांधी असहनीय होने लगे। इस बीच जिन विचारों ने गांधी की शारीरिक हत्या की थी, वे ताकतवर हो रहे थे और अंतत: वे विकास के झंडाबरदार भी हो गए। विडंबना यह है कि इन विचारों के कुछ समर्थक लंबे समय तक गांधी विचार का मुखौटा ओढ़े रहे।
आशीष नंदी ने हाल ही में कहा था कि महात्मा गांधी अब राष्ट्रपिता नहीं बल्कि सौतेले राष्ट्रपिता बन गए हैं। राष्ट्रपिता के रूप में उनकी जगह सावरकर ने ले ली है। हमारे समय को समझने के लिए यह एक बड़ा रूपक है। गांधी से सावरकरतक की यात्रा प्रेम व अहिंसा से घृणा व हिंसा की ओर की यात्रा ही नहीं है, बल्कि यह ताकत के भौंडे प्रदर्शन और टेक्नोलॉजी के उन्माद की तरफ की यात्रा भी है। एक तस्वीर के रूप में गांधी आज भी सरकारी विज्ञापनों, बैनरों और मुद्राओं पर हैं, मगर उनकी आवाज म्यूट कर दी गई है या फिर उसे कर्कश कोलाहल में दबा दिया गया है। सरकारी हलकों में गांधी एक बेजुबानतस्वीर हैं।
कहा जा सकता है कि भारतीय जन-जीवन में गांधी की जगह अब हाशिए पर है। यह उल्लेखनीय है कियही गांधी हाशिए की आवाज हैं। गांधी विस्थापन, पर्यावरण, नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर केंद्रित सैंकड़ों जन आंदोलनों की भीतरी ताकत हैं।गांधी नर्मदा घाटी से लेकर कुडनकलमतक हैं। गांधी सांप्रदायिक घृणा अभियानों से गहरा रहे अंधेरे के खिलाफ लामबंद होते लोगों के लिए एक टिमटिमाता दिया भीहैं।
भारत के जनमानस का गांधी से ओतप्रोत होना;फिर उनका हाशिए पर चला जाना और अंतत: “गांधी वध क्यों वाले विचारों का गद्दीनशीं होना, यह सब काल के एक छोटे खंड में घटित हुआ है। मगर जिस तरह बुद्ध विचार पूरी तरह विलोपित नहीं किए जा सके, उसी तरह गांधी की उपस्थिति सतह पर भले ही नहीं, मगर सतह के कहीं नीचे भारत के सांस्कृतिक मन की अंतर्धाराओं में लगातार बनी हुई है। 
और यह उपस्थिति कभी भी उभड़ कर ऊपर आ सकती है, फिर से जन-जीवन को आलोड़ित करने, एक नया नैतिक आंदोलन खड़ा करने। भारत के एक राष्ट्र के रूप में नवनिर्मित होने की प्रक्रिया के ईंट-गारे में गांधी इतने ज्यादा रचे-बसे हैं कि स्वाधीन व लोकतांत्रिक भारत की पक्षधर कोई भी विचार सरणीन तो गांधी से एकदम निरपेक्ष हो सकती है और न उनकी कट्टर विरोधी। गांधी के विरोध में जाने का अर्थ भारत के उस विचार के खिलाफ जाना है, जो राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के दौरान पैदा हुआ। एक अहिंसक, स्वावलंबी, न्यायपूर्ण और समावेशी भारत का विचार।

गांधी गांधीवाद की किसी चौहद्दी में नहीं समाते। न्याय, शांति और बराबरी का सपना देखने वालों में हमेशा ही बहुत से मतभेद होंगे। प्राथमिकताओं, कार्य पद्धतियों में भिन्नता होगी। यदि भारत के विचार से खुद को जोड़ता है और फिर भी गांधी की किसी बात से असहमत होता है तो उसके विचार को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इन असहमतियों को आपस में बतियाना चाहिए—बहुलता, भिन्नता, सहिष्णुता जैसे मूल्यों को मजबूत करने के लिए भी।असहमति, संवाद और घृणा के फर्क को हमें समझना होगा। 
अक्टूबर 2017 में प्रकाशित |
 पेशे से व्‍याख्‍याता। लंबे समय तक पत्रकारिता की। जनसत्ता में रहे। सामाजिक आंदोलनों से जुड़ाव रहा। सम्पर्क  - ishwardost@gmail.com 

गांधी की खोज में : मणीन्द्र नाथ ठाकुर

गांधी की खोज में

मणीन्द्र नाथ ठाकुर


समाज किसी नदी की तरह अविरल कैसे प्रवाहित रहता है? हज़ारों वर्षों से नाते-रिश्ते, ज्ञान, अज्ञान, सामाजिक संस्थाएँ, कैसे चलती रहती हैं? यह सवाल बचपन से मेरा पीछा करता रहा है। ऐसा नहीं है कि समाज में बदलाव नहीं आता है, लेकिन सभ्यता के मूल्य समाज में बने रहते हैं। हाल में जब मारियो लोसा का उपन्यास ‘स्टोरी टेलर’ पढ़ने का मौक़ा मिला तो बात समझ में आयी कि हर समाज अपनी कहानी आनेवाली पीढ़ी को कहता है। संगीत, साहित्य, कला, क़िस्सा, कहानी, गप्प, चटकुला, नाटक, उपन्यास, धर्म ग्रंथ, ये सब के सब मनुष्य के उन प्रयासों के परिणाम हैं जो वह समाज की निरंतरता को बनाए रखने के लिय करता है। हम में से हर किसी को अपनी कहानी कहने का हक़ है। अपने नज़रिए से समाज की कहानी कहना हमारा दायित्व भी है। अपने इसी दायित्व बोध के कारण मैन गांधी की एक कहानी कहना चाहता हूँ। इस कहानी कि शुरुआत मैं इस सवाल से करना चाहता हूँ कि क्या गांधी भारतीय समाज की सामूहिक चेतना में गहरे उतर गए थे या फिर सामूहिक चेतना ने अपने अमूर्त गांधी को मोहन दास में मूर्त रूप दे दिया था?
अमूर्त और मूर्त के तर्क को थोड़ा और खोल देना ठीक रहेगा। गीता में एक श्लोक है “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ! अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम !!” इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि अधर्म से मुक्ति दिलाने वाले एक महापुरुष की कल्पना इस समाज के सामूहिक चेतना में रहती है। धर्म का अर्थ किसी रिलिजन से नहीं होकर प्रकृतिक नियमों पर आधारित नीतियों से है, जिससे समाज का बेहतर संचालन हो सकता है। एसा भी कह सकते हैं कि धर्म का अर्थ उन सामन्य सर्वमान्य नीतियों से हैं जिससे व्यक्ति के जीवन में संतुलन बना रहे और समाज सुचारू रूप से चल सके। श्लोक के अनुसार ऐसे धर्म की हानि या अधर्म के बढ़ जाने से समाज उस महपुरुष के अमूर्त रूप को एक मूर्त रूप दे देता है। महपुरुष कोई अवतरित नहीं होते हैं, बल्कि बनते हैं और समाज लगातार अपने समर्थन से उसे प्रेरित कर उस ओर आगे बढ़ाता है। अनायास ही महापुरुष की पहुँच आम जन तक हो जाती है, क्यंकि उसकी चेतना भी उस सामूहिक चेतना का हिस्सा है। समाज ऐसे व्यक्ति को लगातार उस अमूर्त महापुरुष की कसौटी पर कसता भी रहता है, उसकी आलोचना भी करता रहता है।

हम जब भी अपनी अपने जीवन से जोड़कर किसी महापुरुष की कहानी कहते हैं तो एक तरह से वह मूर्त महापुरुष की समाज की सामूहिक चेतना में उपस्थिति को दर्ज करने का प्रयास ही होता है। निश्चित रूप से इसकी सीमा यह होगी कि हम जिस समाज में से होते हैं वही हमारे देखने के नज़रिय को तय करता है। लेकिन ये बातें सार्वभौमिक न भी हों तो काम से कम सर्वजानिक तो हैं ही। ऐसी कहानियों से एक उम्मीद यह होती है कि यदि भविष्य में कुछ लोग इसे पढ़ कर यह जान पाएँ कि हमारे समाज में गांधी किस तरह से रच बस गए थे तो शायद उनमें गांधी से संवाद करने की इच्छा भी जग जाए। ऐसे महापुरुषों की जो ख़ूबियाँ या ख़ामियाँ रहीं हो उनको समझने में कुछ सहायता मिल जाए। कई बार ऐसा लेखन अपने समाज के साथ संवाद में भी हमारी सहायता करती है। मैंने गांधी नहीं देखा है, लेकिन मेरे समय के समाज में गांधी की उपस्थिति व्यापक तौर पर थी। गांधी एक विचार बन गए थे, एक जीवन पद्धति का नाम था। कुछ बदलाव के साथ गांधी अभी भी हमारे साथ हैं, शायद ज़्यादा व्यापक फलक के साथ।

इस संदर्भ में एक वाक़या मुझे याद है। पिछली गर्मी में मैं लंदन पार्लियामेंट स्क्वेर के पार्क में बैठकर कुछ दोस्तों से बातें कर रहा था। तभी किसी स्कूल के बच्चे अपने शिक्षकों के साथ वहाँ आए। उस पार्क में चर्चिल, नेलसन मंडेला, रोबार्ट पील, अब्राहम लिंकन जैसे महान लोगों की मूर्तियाँ लगी हुई हैं। उनमें एक मरती गांधी की भी है और शायद अकेली मूर्ति है जो किसी सत्ता से जुड़ी न हो। मेरे आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा जब मैंने देखा कि सारे बच्चे गांधी की मरती के आस-पास जमा हो गए। मैंने शिक्षक से जानना चाहा कि क्या ऐसा कोई निर्देश था उनके लिय। बिना किसी पूर्व निर्देश के ब्रिटेन के बच्चों का गांधी में रुचि होना मेरे लिय एक सुखद आश्चर्य था। शायद यह गांधी के बड़े सम्भावना का सूचक है; दुनियाँ की ज़रूरत का सूचक है।

इस घटना ने मुझे अपने गाँव और शहर के बच्चों की याद दिलाने लगा और मुझे लगा कि शायद ही कोई है उन्हें यह बताने के लिय कि गांधी हमारे समाज का एक आदमी था जिसने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। इसलिय मैं ने अपने अनुभव को सहेजने का तय किया। अकादमिक तौर पर शायद इतना महत्वपूर्ण न भी हो, लेकिन यदि इसे पढ़ कर गांधी को खोजने का मन करने लगे तो मैं संतुष्ट हो जाऊँगा।

वैसे एक अकादमिक महत्व की बात भी इस पुस्तक से जुड़ी है। मुझे यह लगने लगा है कि हमारा समाजशास्त्र एक छलावा है। इसका आधार मनुष्य के अवास्तविक अवधारणा पर टिका है जिसके मूल में डेकर्त के मानस और शरीर का द्वंद्ववादी दर्शन है और वास्तविकता को भौतिक और आध्यात्मिक में बाँट कर देखे जाने की परम्परा है। इस दर्शन पर टिका है आधुनिक विज्ञान का दर्शन और उस पर टिका है समाजशास्त्र का दर्शन। ऐसा समाजशास्त्र न हमें समाज की सही समझ दे सकता है न ही समाज में कुछ मानवतापरक बदलाव ही ला सकता है। ऐसे समाजशास्त्र केवल राज्य को ताक़तवर बनाता है, क्योंकि उसे समाज पर अंकुश लगने का ज्ञान देता है।इसका क्या कारण हो सकता है? ऐसी बिडंबना क्या है कि भारत के जिन चिंतकों ने समाज के अपने समझ के द्वारा उपनिवेश्वादी ताक़तों से लड़ाई की, सामाजिक सुधार आंदोलन चलाया, लोगों के सोचने के तरीक़ों में भारी परिवर्तन लाया, स्वतंत्रतापूर्व के विश्वविद्यालयों के ज्ञान विमर्श में उन्हें सही जगह नहीं मिली? जिनके दर्शन ने विशाल सामाजिक परिवर्तन लाया क्या उन्हें समझे बिना हम किसी रचनात्मक समाजशास्त्र की बात भी कर सकते हैं? इन सवालों के उत्तर कई तरह से दिए जा सकते हैं। मेरी समझ में, उपनिवेश्वाद ने हमारे समाज को बौद्धिक तौर पर ग़ुलाम बनाने का प्रयास किया। स्वतंत्रता संग्राम में इस प्रकिया की एक समझ बन पायी और इसके विरोध में विचारों के स्वराज की घोषणा की गई। लेकिन स्वतंत्रता के बाद ज्ञान सृजन की प्रकिया की मुक्ति के लिय संघर्ष का सम्बंध विच्छेद हो गया। हम राजनैतिक स्वतंत्रता की लड़ाई तो जीत गए लेकिन बौद्धिक स्वराज की लड़ाई हार गए। हम अभी भी उपनिवेश्वादी ताक़तों को अपने से ज़्यादा विकसित और बौद्धिक तौर पर प्रबुद्ध मानते रहे।


इस छोटे से क्षेपक के बाद वापस भारतीय विश्वविद्यालयों में गांधी जैसे चिंतकों से संवाद के अभाव के कारणों के विचार पर आया जाए। इसी संदर्भ में मैंने यह बात कही है कि हम एक तरह से पश्चिमी जगत के ज्ञान के चकाचौंध में जी रहे हैं। विज्ञान के क्षेत्र के उनके विकास को उनका सर्वांगीन विकास मान ले रहे हैं। उनके उपलब्धियों को तो सही मानते ही हैं, उनकी कमियों को भी अनुकरणीय मान लेते हैं।ऐसा मनना बहुत ग़लत भी नहीं है कि आधुनिक भारतीय विश्वविद्यालयओं में एक तरह के नक़ल की परम्परा चल पड़ी है। इस नक़ल से विज्ञान में तो कुछ हासिल हो भी सकता है, दर्शन और समाजशास्त्र में बहुत कुछ मिल पाना मुश्किल ही लगता है। नक़ल की इसी परम्परा ने गांधी, अम्बेडकर, टैगोर जैसे चिंतकों को विश्वविद्यालीय व्यवस्था से दूर रखा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन चिंतकों ने भारतीय समाज की आत्मा को समझने का प्रयास किया और उसमें आ गए ठहराव से निकाल कर उसे गतिशीलता प्रदान की। इस गतिशीलता ने भारतीय सामज को उपनिवेशवाद के विरोध में संघर्ष के लिय ऊर्जा प्रदान किया और साथ ही अपने इतिहास से निकाल कर नए वर्तमान की ओर अग्रसर किया। लेकिन स्वतंत्रता के बाद के ज्ञान सृजन की प्रक्रिया उस सामज़िक परिवर्तन के उद्देश्य से भटक गया जिसने इन चिंतकों को आंदोलित किया था। ऐसे में जब समाजशास्त्री इन चिंतकों को पश्चिमी मापदंड पर परखने की कोशिश करते हैं तो इनके विचारों से उनका प्रभावित होना मुश्किल हो जाता है।


विश्वविद्यालयों में भले ही गांधी को महत्व नहीं दिया गया हो, लेकिन क्या समाज में गांधी की उपस्थिति रही है? क्या गांधी ने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया है? क्या इस प्रभाव को देखपाना सम्भव है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने का एक तरीक़ा तो यह हो सकता है कि हम कोई सर्वे करें, लोगों से बातचीत करें और फिर प्राप्त उत्तर को कुछ प्रामाणिक तौर सामने रखें। ऐसा किया तो जा सकता है और मैं करना चाहता भी हूँ क्योंकि तभी हम गांधी बनने और उसके प्रभावकारी होने की प्रक्रिया को ठीक से समझ सकते हैं। लेकिन इसके लिय समय और साधन की जो आवश्यकता है, अभी मेरे पास नहीं है। इसलिय मैंने यह तय किया है कि मेरी अपनी ज्ञान यात्रा के अलग-अलग पड़ाव पर जिस तरह से गांधी से सामना हुआ है पहले उसे ही समझ लिया जाए। गाँव के एक छोटे से विद्यालय में अध्ययन से लेकर दिल्ली विश्व वदयालय में अध्ययन और अध्यापन और अंत में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में अध्यापन तक की मेरी यात्रा बहुत छोटी भी नहीं रही है। लगभग पचास साल की इस यात्रा में आसप्पस गांधी की उपस्थिति से जिस तरह मेरा अपना ही सामना हुआ है उसे भी एक तरह के शोध सामग्री की तरह देखा जा सकता है। इस सामग्री का उपयोग मेरे लिय सहज भी है और प्रामाणिक भी।

इस यात्रा के कई पड़ाव हैं। यहाँ उनका संक्षेप में ज़िक्र करना उचित होगा, ताकि इस यात्रा के एक झलक मिल जाय। मैं अपनी यात्रा के शुरुआत छोटे से विद्यालय से करना चाहता हूँ। सत्तर के दशक में इन विद्यालयों में गांधी जयंती एक ख़ास तरीक़े से मनाया जाता था। उसी समय इसमें बदलाव भी आना शुरू हो गया था। शायद पहले शिक्षकों और बच्चों में गांधी जयंती एक आंतरिक उत्साह पैदा करता था, लेकिन धीरे-धीरे मात्र औपचारिकता रह गई।

कक्षा छह में मुझे एक गाँव के विद्यालय के छात्रावास में डाल दिया गया। यहाँ गांधी न केवल दैनिक जीवन में उपस्थित थे बल्कि शिक्षकों की प्रतिबद्धता में गांधी को आप देख सकते थे। यह अद्भुत विद्यालय था गाँव से दूर खेतों के बीच बने इस विद्यालय को आदर्श विद्यालय की संज्ञा दी गई थी। अद्भुत प्रतिबद्धता थी शिक्षकों में। अपने गणित के शिक्षक मौलवी वसारत क़रीम की मुझे बहुत याद आती है। औपचारिक पढ़ाई ख़त्म होने के बाद उनका काम फिर शुरू हो जाता था। चुने हुय छ्त्रों के पीछे लग जाते हटे। ‘चक्रवर्ती’ के नाम से प्रसिद्ध गणित की किताब जैसे उन्हें याद हो और उस हमारी बुद्धि में घुसा देना चाहते हों। लगे रहते थे लगातार। उनके प्रतिबद्धता के पीछे प्रेरणा क्या थी? उस वक़्त तो हमें पता ही नहीं चला। आब सोचता हूँ कि शायद गांधी उन्हें प्रेरित करते हों। खादी का सफ़ेद कुर्ता और पजामा, गले में एक चेक ग़मछा। हमेशा सवालों को बताने के लिय तत्पर, जैसे राष्ट्र निर्माण का उनका यही तरीक़ा था। और भी कई शिक्षक थे, अवकाशप्राप्त कर घर नहीं जाते थे। वहीं गांधीवादी तरीक़े से रहते थे। अब हमें लगता है कि जिसने भी इस विद्यालय की कल्पना की होगी निश्चितरूप से गांधी के दर्शन से प्रभावित थे।


फिर इस विद्यालय से एक और सरकार द्वारा संचालित पब्लिक स्कूल के छात्रावास में गया। इस विद्यालय की स्थापना ही गांधी-नेहरु के वैचारिक पृष्ठभूमि में हुआ था और इसलिय उन मूल्यों का आभास मिलना मुस्किल नहीं था। होस्टल की जगह आश्रम थे, आश्रमाध्यक्ष श्रीमान जी और उनकी पत्नी माता जी थीं। खादी पहनना, आश्रम की सारी सफ़ाई ख़ुद करना, बिलकुल गांधीवादी जीवनचर्या, काहसियत थी इस विद्यालय की। इसकी स्थापना में एक अंग्रेज़ एस0 जी0 पीयर्स0 का अबड़ा योगदान था। उन्होंने भारत के अन्य विद्यालयों को भी बनाया था, जैसे: सिंधिया, कृष्णमूर्ती फ़ाउंडेशन, दूँ स्कूल आदि। लेकिन सुना है कि यह विद्यालय उनका सपनों का साकार होना था। शुरू में जितने शिक्षक यहाँ आए उसमें नेहरु जी का बड़ा सहयोग था। जीवन नाथ दर ने तो असी के उम्र में आकर हमें छाओ ‘चले गाँव की ओर’ का नारा दे कर हमें आंदोलित ही कर दिया था।

यहाँ से निकलने के बाद फिर कॉलेज में आया, जहाँ गांधी दिखते ही नहीं थे और न ही उनके मूल्य दिखते थे। लगता था जैसे गांधी कभी हुए ही नहीं। बहुत ही हिंसक समय था, छात्रों और शिक्षकों में अविश्वास भरा था। यहाँ से दिल्ली विश्वविद्यालय आना हुआ, और फिर गांधी की जगह मार्क्सवाद ने ले लिया। यहाँ तक नक्सलवादी तर्क भी प्रभावित करता रहा। लगभग रोज़ बहस होता था शिक्षकों और दोस्तों के बीच। पूरा कन्फ़्यूज़न था। उसे विश्व विद्यालय के एक कॉलेज में शिक्षक भी हो गया। यहाँ तक कि वहाँ पढ़ाने के क्रम में भी गांधी ने कभी आकर्षित नहीं किया। हाँ एक शिक्षक थे रणधीर सिंह। कट्टर मार्क्सवादी थे। अद्भुत शिक्षक थे और दिल्ली विश्वविद्यालय में लोकप्रिय होने के साथ-साथ बहरत के बड़े बुद्धिजीवियों में गिने जाते थे। गांधी की आलोचना तो करते थे लेकिन उन्हें महत्वपूर्ण मानते थे। उनहिने संवाद पर ज़ोर दिया। किसी ने उनसे पूछा था कि ‘क्या गांधी मार्क्सवादी था? क्या वह उदारवादी था? क्या आज के संदर्भ में गांधी का कोई महत्व है?’ उनका उतार अद्भुत था: ‘गांधी न तो मार्क्स वादी थे, न ही उदारवादी थे और इसलिय आज के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण हैं।” यहाँ से गांधी को और समझने की इच्छ जागृत हुई।

तभी संयोग से आख़िरी पड़ाव, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में आना हुआ। यहाँ थोड़ा ठहराव आया। यहाँ तो मार्क्स और गांधी के अलावा अम्बेडकर भी उपस्थित थे। अब तक अम्बेडकर कोई ख़ास पाला नहीं पड़ा था। दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान थोड़ा पढ़ना तो शुरू किया था, लेकिन कोई ख़ास प्रभावित हुआ हो ऐसा नहीं कहा जा सकता है। यहाँ आकर तो भारतीय राजनीतिक चिंतन और भारत में जनांदोलन जैसे पाठ्यक्रमों को पढ़ाने के दौरान चिंतन का मौक़ा मिला और दृष्टिकोण बदलने लगा। फिर गांधी, मार्क्स और अम्बेडकर को एक साथ पढ़ाने के लिय एक कोर्स पढ़ाने लगा। यह तो पढ़ने-पढ़ाने की यात्रा थी। लेकिन इसके साथ ही शोध यात्रा की भी शुरुआत हुई, संयोग से कई ऐसे छात्र मेरे साथ आए जिन्हें गांधी में रुचि थी। और फिर सिलसिला शुरू हुआ गांधी को नज़दीक से देखने का। विज्ञान, पानी, हिंसा, धर्म, किसान आदि कई मुद्दों पर मेरे साथ शोधकर्ताओं ने मेरा बहुत ज्ञानवर्धान किया। मैं अपनी इस यात्रा के कहानी कहना चाटा हूँ, ताकि पढ़नेवालों को भी यात्रा का आनंद मिल सके। विचार यात्रा में यदि कहीं बहस की गुंजाइस है तो वहीं से गांधी पर नए शाइअर से सोचने के लिय ऊर्जा भी मिल सके।

अक्टूबर 2017 में प्रकाशित


लेखक समाजशास्त्री और जेएनयू में प्राध्यापक हैं |
सम्पर्क - +919968406430 , manindrat@gmail.com